Best Story Vikram Betal Ki Kahani King and Servant-बेताल पच्चीसी-2021

    Vikram Betal Ki Kahani King and Servant

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    एक समय की बात है रूपसेन नाम का राजा वर्धमान नगर मै राज करता था। उसकी प्रजा भी उससे बहुत खुश थी वो अपनी प्रजा का बड़ा धियान रखता था।

    एक दिन उसके राज्य मै एक साधु आया और राजा रूपसेन से मिला। साधु ने भविष्यवाणी की के राजा की जान को खतरा है और राजा को तुरंत एक होनहार आज्ञाकारी ताजपूत को अपनी सुरक्षा के लिए नियुक्त करना चाहिए। राजा ये सुन कर बहुत चिंता मै पद गया।

    राजा ने दरबारियों को बुलाया और आदेश दिया एक ऐसा राजपूत को धुडा जाए जो साधु द्वारा बताए गए गुड़ रखता हो। कुछ समय के बाद ही दरबारी एक राजपूत को ले कर आ गए।

    राजा ने कहा “तुम्हारा नाम क्या है?’ राजपूत ने जवाब दया “मेरा नाम वीरवार है और मै तलवार का धनि हूँ” राजा ये सुन कर खुश हो गया राजा ने कहा “हम तुम्हे अपना अंगरक्षक नियुक्त करते है बताओ बदले मै तुम्हे कितना धन चाहिए” वीरवार ने जवाब दिया “महाराज मुझे बदले मै हज़ार तौला सोना रोज़ चाहिए”

    राजा सुन कर अचंभित हो गया इतने धन का ये क्या करेगा। राजा ने पूछा “तुम्हारे घर में कितने लोग रहते है?” वीरवार ने जवाब दिया “मेरे साथ मेरी पत्नी एक बीटा और एक बेटी रहते है।” राजा ने कहा “इतने धन का तुम क्या करोगे ये तो बहुत अधिक है”

    वीरवार ने कहा ये धन राजा की जान के बदले कुछ भी नहीं बदले मै कोई भी विपदा पहले मुझसे टकराएगी” राजा ने वीरवार की बात मन ली और उसे रोज़ हज़ार टोले सोना देने लगा। वीरवार रोज़ रात राजा के कमरे से बहार पहरा देता अगर राजा को किसी चीज़ की ज़रूरत होती तो उसे भी पूरा करता और सुबह अपना हज़ार टोले सोना ले कर चला जाता।

    उसमे से आधा ब्राह्मणो को देता और बाकि के दो हिस्से करता और एक हिस्सा मेहमानों, वैरागियों और संन्यासियों को देता और दूसरे हिस्से से खाना बना कर भूखों को खिलता अगर बचा जाता तो घर ले जाता और परिवार के साथ खाता।

    एक बार मरघट से किसी के रोने की आवाज़ आई तो राजा ने कहा वीरवार “जाओ और देखो कौन रो राजा है और उसे क्या परेशानी है?” वीरवार तत्काल मरघट पंहुचा और देखा एक स्त्री सर से पाऊं तक गहनों से लदी है और कभी नाचने लगती है तो कभी रोने लगती है।

    किन्तु उसके आँख मै कोई भी आंसू नहीं आते। वीरवार ने पूछा “तुम कौन हो और रोटी क्यों हो?” उसने कहा, “मैं राज-लक्ष्मी हूँ। नाचती इसलिए हूँ क्यों के मुझे भविष्य दिखाई देता है और रोती इसलिए हूँ कि राजा रूपसेन के घर में खोटे काम होते हैं, इसलिए वहाँ दरिद्रता का डेरा पड़ने वाला है।

    मैं वहाँ से चली जाऊँगी और राजा दु:खी होकर एक महीने में मर जायेगा।” ये सुन कर वीरवार चिंता मै पड़ गया और सोचने लगा राजा की सुरक्षा उसका दायत्व है। वीरवार ने कहा “क्या इस समस्या का कोई उपाए है?” उसने जवाब दिया है “हाँ है किन्तु वो बहुत कठिन है तुम कर नहीं पाओगे।”

    वीरवार ने जवाव दिया “अपने राजा की सुरक्षा के लिए मै अपने प्राण भी त्यागने को तैयार हूँ। तुम बताओ मुझे क्या करना होगा?” “यहाँ से पूरब में एक योजन पर एक देवी का मन्दिर है। अगर तुम उस देवी पर अपने बेटे का शीश चढ़ा दो तो विपदा टल सकती है।

    फिर राजा सौ बरस तक बेखटके राज करेगा।” उसने वीरवार को उपाए बताया। वीरवार तुरंत अपने घर पंहुचा और अपनी स्त्री और बेटे को सारी बात बता दी और अपने बेटे से पूछा “बताओ बेटा क्या करना चाहिए?” बेटे ने जवाब दिया “राजा की सेवा से बड़ा धर्म कोई और नहीं होता हम राजपूत है और राजा की सुरक्षा का वचन आपने दिया है आपको अपना वचन निभाना चाहिए।

    अगर मेरी मिर्त्यु इसी तरह लिखी है तो कोई टाल नहीं सकता और देवी के चरणों मै मरने का सौभाग्य हर किसी को नसीब नहीं होता मै तैयार हु” उसने अपनी पत्नी से पूछा तो पत्नी बोली “पत्नी का धर्म पति की सेवा करने में है। जैसी आपकी आज्ञा मै भी तैयार हूँ” तीनो की सहमति के बाद वीरवार अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ देवी के मंदिर मै पहुंच गया।

    वीरवर ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी, मैं अपने बेटे की बलि देता हूँ। मेरे राजा की सौ बरस की उम्र हो।” इतना कह कर वीरवार ने एक ज़ोर का वार किया और बेटे का सर काट कर देवी के चरणों मै गिर गया। ये देख बहन चिल्लाई “मेरे भाई को मार दिया अब मै जी कर क्या करुँगी” उसने भी तलवार से अपना सर काट लिया और मर गई।

    अपने दोनों बच्चों को मरा हुआ देख माँ बहुत दुखी हुए और उसने भी अपना सर काट लिया और मर गई। ये देख वीरवार ने भी सोचा मेरा पूरा परिवार मर गया अब मै किसके लिए जीऊंगा और उसने भी अपनी गर्दन काट ली और मर गया।

    अगले दिन राजा ने दरबारियों से कहा “वीरवार को मैंने शमशान बेजा था वो वापस नहीं आया जाओ उसे ढूंढ कर मेरे पास लाओ।” कुछ ही देर मै सिपाही वीरवार और उसके परिवार की खबर ले कर आए राजा तुरंत देवी के मंदिर मै पहुंच गया।

    उनके कटे हुए शीश देख कर राजा बहुत दुखी हुआ और कहने लगा “मेरी सुरक्षा की वजह से पूरा परिवार चला गया ऐसा राजा बनने से तो मर जाना अच्छा है।”

    इतना कह कर राजा ने भी वही तलवार उठा ली और अपना शीश काटने लगा ठीक तभी देवी प्रकट हुईं और राजा को रोक लिया और कहा “राजा मै तुमसे प्रसन्न हुई मागो क्या मांगते हो” राजा ने कहा “मेरी वजह से ये चरों मर गए इन्हे ज़िंदा कर दो”

    देवी ने अमृत रस छिड़क कर चरों को ज़िंदा कर दिया। राजा ने देवी का धन्यबाद क्या। कहानी सुना कर वेताल बोला “राजन बताओ इनमे से किसका पुण्य बड़ा है।”

    विक्रम ने जवाब दिया “राजा का पुण्य सबसे बड़ा है।”

    बेताल ने पूछा, “कैसे?”

    विक्रम ने कहा, “इसलिए कि स्वामी के लिए चाकर का प्राण देना उसका धर्म है; लेकिन चाकर के लिए राजा का राजपाट को छोड़, जान को तिनके के समान समझकर देने को तैयार हो जाना बहुत बड़ा पुण्य है।”

    ये सुन बेताल ने कहा “राजन तूने बिलकुल सही कहा किन्तु तू बोला और मै चला”

    ये कह कर बेताल वापस शमशान के पेड़ पर लटक गया। बेताल फिर वापस आया और उसे अपनी पीठ पर लादकर योगी की कुटिया की तरफ चल दिया। बेताल ने कहा “सफर लम्बा है एक और कहानी सुनाता हूँ।

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