Imaandar Lakadhara की दिल को छु लेने वाली Best कहानी-2021

    Imaandar Lakadhara

    Imaandar Lakadhara की दिल को छु लेने वाली कहानी

    Imaandar Lakadhara

    कहानियां ही ज्ञान का एक बहुत बड़ा श्रोत होती है। आज की कहानी Imaandar Lakadhara नैतिक ज्ञान और प्रेरणा से परिपूर्ण है। ये एक ऐसी कहानी है जिसे लगभग हर नौजवान ने अपने बड़ों से सुनी होगी। किन्तु आज की नई पीड़ी इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी मैं ऐसी प्यारी मौलिक लघु कथाओं से वंचित रह जाती हैं।

    इसके लिए इटरनेट एक अच्छा माध्यम है जो आपको वो सिखाता है जो आप अपने बड़ों से नहीं सीख पते अतः आज मेने फैसला किया के मैं आपको imaandar lakadhara की वो दिल को छु लेने वाली कहानी से अवगत कराऊँ जो नैतिक ज्ञान से भरी हुई है।

    Imaandar Lakadhara

    एक समय की बात है किशनपुर गांव में सत्यनारायण नाम का एक Imaandar Lakadhara रहता था। वो Lakadhara इतना Imandaar था के जीवन की कितनी भी बुरी परिस्तिथि हो और उसका कितना भी नुक्सान क्यों न हो जाए वो कभी झूट नहीं बोलता था। उसकी इस खूबी के कारण उसके गांव वाले उसकी बड़ी इज़्ज़त किया करते थे। और उस Imaandar Lakadhara की ईमानदारी के चर्चे दूर दूर थक थे।

    वो दिन भर जंगल से सुखी लकड़ियां काट कर एक बड़ा सा गट्ठर बनाता और शाम को उसे बेच देता इसी से उसका परिवार चलता था। वसके द्वारा लाई गई लकड़ी इतनी सूखी होती के तुरंत ही बिक जाती थी। लोग उसका इंतज़ार करते थे कब वो आए और लकड़ी खरीदें।

    एक दिन वो एक बड़े से तालाब के किनारे अपनी कुल्हाड़ी से लकड़ी काट रहा था। के अचानक उसके हाथ से उसकी कुल्हाड़ी फिसल गई और कुल्हाड़ी तालाब मै गिर गई। तालाब बहुत ही गहरा था और Imaandar Lakadhara को तैरना भी नहीं आता था।

    अब उसकी कमाई का इकलौता सहारा उसकी कुल्हाड़ी उसके पास नहीं थी। इस वजह से वो बहुत परेशान होने लगा। वो सोचने लगा के अब बगैर कुल्हाड़ी के वो लकड़ी कैसे कटेगा?

    और अगर लकड़ी नहीं काटी तो आज उसके घर में खाना बनाने के पैसे कहाँ से आएँगे? और अब उसके बच्चे भूके ही रहेंगे ये सोच कर वो Imaandar Lakadhara रोने लगा।

    उसके दर्द भरे आँसुओं से जैसे वहां का वातावरण दुखी हो गया हो। एक अजीब सी शांति चरों ओर हो गई। तभी एक तेज़ रौशनी हुई और तालाब से एक परी जिसके पर सुनहरे थे बहार आई और बोली “तुम क्यों रोते हो”?

    Imaandar Lakadhara ने जवाब दिया “मेरे पास एक कुल्हाड़ी थी बस वही मेरी कमाई का एक साधन था में रोज़ उसी से लकड़ी काटता और अपने बच्चों को पालता था अब वो इस तालाब मै कही खो गई। अब मेरे बच्चे क्या खाएंगे इसलिए मै रो रहा हूँ”।

    परी ने उसकी दर्द भरी दास्ताँ सुनी और कहा ” तुम परेशान न हो में तुम्हरी मदद करती हूँ में तुम्हारी कुल्हाड़ी इस तालाब से ढूंढ कर लती हूँ”।

    अचानक वो सफेद रौशनी तालाब के अंदर समां गई। अपनी खोई हुई कुल्हाड़ी मिलने इस उम्मीद ने Imaandar Lakadhara को उत्साहित कर दिया और वो तालाब के किनारे खड़ा हो गया। कुछ देर के बाद वो सुनहरे परो वाली परी तालाब से बहार आई उसके हाथ मै सोने की एक कुल्हाड़ी थी जो बहुत चमक रही थी।

    परी ने सोने की कुल्हाड़ी उसके सामने रखते हुए कहा “क्या ये तुम्हारी कुल्हाड़ी है”? Imaandar Lakadhara कुल्हाड़ी देख कर उदास हो गया और बोला नहीं ये तो सोने की है ये मेरी कुल्हाड़ी नहीं है वो तो लोहे की थी शायद अब मेरी कुल्हाड़ी नहीं मिलेगी”

    परी ने कहा “उदास न हो मै एक बार और देखती हूँ शायद तुम्हें तुम्हारी कुल्हाड़ी मिल जाए”। लकड़हारा फिर से उत्साहित हो गया। परी एक बार फिर तालाब में उसकी कुल्हाड़ी ढूंढ़ने चली गई और कुछ देर बात बहार आई। अब उसके हाथ मै चांदी की कुल्हाड़ी थी।

    परी ने चांदी की कुल्हाड़ी उसको देते हुए कहा “ये लो तुहारी कुल्हाड़ी मिल गई”। उसने उदासी भरे शब्दों में कहा “ये तो चांदी की कुल्हाड़ी है में एक मामूली लकड़हारा हूँ सोने और चांदी की कुल्हाड़ी तो मेने देखी भी नहीं है मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की है और ये भी मेरी नहीं है।

    अब मुझे यकीन हो गया मुझे मेरी कुल्हाड़ी नहीं मिलेगी वो खो गई है”। ये कहता हुआ लकड़हारा मूड कर वापस अपने घर की ओर चलने लगा। Imaandar lakdhara बहुत उदास था। परी ने कहा “रुको मुझे एक कोशिश और करने दो मुझे उम्मीद है इस बार तुम्हारी कुल्हाड़ी ज़रूर मिल जाएगी”।

    ये बोल कर परी एक बार फिर तालाब मै चली गई और उदास लकड़हारा वहीँ रुक कर खड़ा हो गया। इस बार परी को वापस आने मै समय लगा। परी को हुए बिलम्ब से Imaandar lakdhara परेशान होने लगा और रोने लगा उसे लगा अब मेरी कोई भी मदद नहीं कर सकता।

    उसने सोचा शायद परी को उसकी कुल्हाड़ी नहीं मिली इसी लिए अब परी उसके सामने नहीं आना चाहती। अब लकड़हारा रोते हुए उठा और अपने घर की ओर चल दिया।

    तभी परी ने उसे आवाज़ दी “रुको Imaandar lakdhara ये लो तुम्हारी लोहे की कुल्हाड़ी” इस बार परी के हाथ मै वही कुल्हाड़ी थी जो खो गई थी। अब लकड़हारे की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था वो लड़खड़ाता हुआ भागा और परी के पास पहुंच कर बोला “हाँ यही मेरी कुल्हाड़ी है आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने मेरी कुल्हाड़ी ढूँढ दी। में सदैव आपका आभारी रहूँगा”।

    लकड़हारे के चेहरे पर ख़ुशी देख कर परी मुस्कुराते हुए बोली “ऐ Imaandar lakdhara ये तो मामूली सी कुल्हाड़ी है इससे पहले मेने तुम्हे सोने और चांदी की कुल्हाड़ी ला कर दी तुमने उसे क्यों न लिया”?

    लकड़हारे ने जवाब दिया “मेरी मदद करने वाली परी वो मेरी नहीं थी और जीवन की किसी भी परिस्तिथि मै में झूट नहीं बोल सकता। लोग इसी वजह से मेरा सम्मान करते है। अगर आज मै झूट बोलता और वो कीमती कुल्हाड़ी ले जाता तो मेरे जीवन भर की तपस्या भंग हो जाती। मेने परेशानी उठाना चुना इसलिए वो कुल्हाड़ी नहीं ली”।

    Imaandar lakdhara के इस जवाब से परी बहुत प्रसन्न हुई और कहा “मेने तुम्हारी ईमानदारी के चर्चे सुने थे अतः आज मेने तुम्हारा इम्तेहान लेने के लिए ऐसा किया मेने ही तुम्हारी कुल्हाड़ी तालाब में गिराई थी ताकि तुम्हारी परीक्छा ले सकूँ”।

    “तुम्हारी इस ईमानदारी से मै बहुत प्रसन्न हुई हूँ और तुम्हे इनाम देना चाहती हूँ। ये लो ये वही सोने और चांदी की कुल्हाड़ी है”

    परी ने दोनों कुल्हाड़ी उसे दे दी। लकड़हारा इतना बड़ा इनाम देख कर बहुत प्रसन्न हुआ और परी का धन्यवाद कर घर वापस आया।

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    कहानी से सीख

    यह कहानी हमें ईमानदारी की एक बहुत बड़ी सीख देती है ईमानदारी हमेशा से ही प्रशंसा की पात्र रही है. ईमानदारी हमारे नैतिक गुणों में चार चाँद लगाती है और फलस्वरूप हमें इसका बेहतर फल हमेशा मिलता है. इसलिए अपने काम के प्रति, खुद के प्रति और हर स्थिति में ईमानदार रहना चाइए आपको आपकी ईमानदारी का फल अवश्य मिलेगा।

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